क्या माँ को ठंड नहीं लगती है?

हम बैठे ओढ़ रजाई को,
फरमाइश कई करते है,
माँ उठ जाती झट से बिन हिचकिचाए,
क्या उसे ठंड नहीं लगती है?

सुनो यह लादो, सुनो वो लादो,
पापा की भी सब करती है,
बिन बोले ठंड बहुत है आज,
क्या उसे ठंड नहीं लगती है?

जहां दिन में हाथ पानी से बचाए,
बस बिस्तर पर पड़े रहते है,
वहीं दूसरी ओर ना रसोई में उसी पानी बर्तन भी धोया करती है
क्या सच में उसे ठंड नही लगती है?

भाई बोले तू ले आ,
मैं बोली तू खुद उठ जा,
इस कहते कहते वो सब हमें ला देती है,
शायद सच में उसे ठंड नही लगती है।

लगे अपने कामों हम चिड़चिड़े हो जाते है,
नाज़ नखरे भी सारे उठाती,
ठंड तो उसे भी लगती ही है,
पर पक्का परिवार के लिए वह सब भूल जाती है,
देख कर बच्चो को अपने,
एक पैर पर भी खड़ी हो जाती है।
मानो माँ को भी ठंड आवश्य लगती है।

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